Saturday, November 29, 2008

एक माँ का संदेश


राग दरबारी




सुनयना देवी, उम्र 65 साल, गाँव मल्लाहा, जिला आजमगढ़ ने यह संदेश लिख कर नहीं भेजा है। किसी से लिखवाया भी नहीं है। शुक्रवार को वे सपने में आई थीं। उन्होंने टुकड़ों-टुकड़ों में जो-जो कहा, वह मैंने सुबह उठ कर लिख लिया। सुनयना देवी मेरे लिए माँ की तरह हैं। उनके दो बेटे हैं। हैं नहीं, थे। वे मुझे अपना तीसरा बेटा मानती हैं। बहुत पहले मैं गांव गया था। तब उनके पति जीवित थे। वे एक स्कूल में चपरासी थे। एक रात अचानक दोनों की तबीयत खराब हो गई। उलटियाँ, दस्त और बुखार। पड़ोसियों को लग रहा था, दोनों प्राणी चल बसेंगे। मेरा अंदाजा था, खाने से संक्रमण हुआ है। इसकी दवा मैं जानता था। लपक कर कस्बे गया। दवा ला कर उन्हें खिलाई। शाम तक वे ठीक होने लगे। सुनयना देवी ने कहा, तू मेरा तीसरा बेटा है। तब से वे बराबर मेरा हालचाल लेती रहती हैं, हालांकि उसके बाद सिर्फ एक और बाद गाँव जाना हुआ। दूसरी बार गया था, तो वे अकेली थीं। पति गुजर चुके थे।


वही सुनयना देवी सपने में आईं। मुंबई में आतंकवादियों के हमले और हमारे सुरक्षा जवानों द्वारा उनसे मुठभेड़ के दृश्य टेलीविजन पर देखते-देखते मैं सो गया था। सुनयना देवी का चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था। सिर पर पतली-पतली जटाएँ थीं। कपड़े मैले-कुचैले। पर आँखों की चमक बरकरार थी। बहुत पहले गोर्की के उपन्यास 'माँ' पर आधारित नाटक में पावेल की माँ को जैसा देखा था, वैसी ही लग रही थीं। उन्होंने कहा, बेटे, तुम सो रहे हो न। मैं तुम्हें जगाने नहीं आई हूँ। बस तुम्हें देखने का मन था। चली आई।


सपने में मैं उठ कर बैठ गया। सुनयना देवी भी मेरे सामने बैठ गईं। उन्होंने मेरी दोनों हथेलियाँ अपनी दुबली और कमजोर हथेली में ले लीं। बोलीं, बेटा, तुम दिल्ली छोड़ दो। यह बूचड़खाना है। किसी दिन तुम भी मारे जाओगे। उसके बाद मैं बिलकुल बेसहरा हो जाऊँगी।


मैंने कुछ पूछा नहीं। बस उन्हें देखता रहा। वे बोलीं, सुबह बंबई से लछमन का फोन आया था कि मेरा छोटा बेटा रमेसर वीटी स्टेशन पर मारा गया। वह वहाँ भेलपूरी का खोमचा लगाता था। अचानक कुछ दाढ़ीवाले छोकरे आए और अंधाधुंध गोली चलाने लगे। रमेसर सहित सात लोग मारे गए। बहुत-से लोग घायल हुए।


मेरी चेतना मानो सुन्न थी। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था। बस देख और सुन रहा था। सुनयना देवी ने कहा, बड़ा बेटा सुरेसर दो साल पहले दिल्ली में मारा गया था। ऐसी ही घटना हुई थी। सुरेसर सरोजिनी नगर मारकेट में रूमाल, मोजे आदि की फेरी लगाता था। अचानक एक दिन बम फटा और वह उसकी चपेट में आ गया। गाँव के जिस लड़के ने खबर दी, उसने बताया था कि उसके इतने टुकड़े हो गए थे कि लाश पहचानी नहीं जा रही थी। बाएँ हाथ में गोदना था, उसी से पता चला कि सुरेसर ही है। हमारे पास दिल्ली जाने का किराया नहीं था। जाके भी क्या करते। बहुतों की जान गई थी। वैसे ही हमारा बच्चा जाता रहा। सबर कर लिया। चलो, रमेसर तो अभी जिन्दा है।


सुनयना देवी की आवाज में बहुत दर्द था। पर वे रो नहीं रही थीं। कुछ देर चुप रहने के बाद वे कहने लगीं, आज रमेसर भी नहीं रहा। वह भी बड़े भाई की राह लगा। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। ये आतंकवादी लड़के भी किसी माँ के जाए होंगे। उन्हें पता नहीं कौन पट्टी पढ़ा रहा है कि वे जान लेने और जान देने पर उतारू हो जाते हैं। सुना है, मनमोहन सिंह बहुत पढ़ा-लिखा आदमी है। वह कुछ करता क्यों नहीं? आडवाणी जी को लोग लोहे का इनसान कहते हैं। वह जब सरकार चला रहा था, उसने भी कुछ नहीं किया। उसी के टाइम में संसद पर हमला हुआ था। अब कहता है, एक बार हमें फिर मौका दो, हम सब ठीक कर देंगे। कैसे ठीक कर दोगे, भइया ? कुछ बताओ तो। हमारी इतनी बड़ी सेना है। उसे देश की रक्षा करने में क्यों नहीं लगा देते? सीमा पर वे झक ही तो मारते होंगे।


सुनयना देवी के चेहरे पर दुख की परत गाढ़ी होती जा रही थी। इस बार वे ज्यादा देर तक चुप रहीं। बोलीं, पहले सोचा, तुम्हें चिट्ठी लिखवा दूँ। समय बहुत खराब है। सरकार-पुलिस सब नाम भर के हैं। जो चाहे, हमारे मुलुक में घुस जाए और ठांय-ठांय करने लगे। ऐसी हालत में गाँव में रहना ही ठीक है। तुम वहीं चलो। पढ़े-लिखे हो। स्कूल खोल देना और बच्चों को पढ़ाना। सरकारी स्कूल में बिलकुल पढ़ाई नहीं होती। तुम्हारा स्कूल चल निकलेगा। फिर मन में आया, चिट्ठी पता नहीं कब पहुँचेगी। चली ही जाऊँ। जो लिखवाना है, सीधे बोल दूँगी। हाँ बेटा, तुम तुरंत दिल्ली छोड़ दो। बड़े शहरों में कभी भी, कुछ भी हो सकता है। तुम्हें बेटा माना है, तो तुम्हारी हिफाजत के बारे में सोचना हमारा फर्ज है। इसी तरह सारे लोग दिल्ली, बंबई छोड़ दें, तो सरकार की अकल ठिकाने लग जाएगी।


सुनयना देवी अभी बोल ही रही थीं कि मेरी आँख खुल गई। मैं चौंक कर उठ बैठा। कमरे में अंधेरा था। क्या यह अंधेरा पूरे मुल्क में हैं, मैं सोचने लगा। फिर उस कमरे में गया जहाँ टीवी है। उसे चला दिया। मुंबई में मुठभेड़ अभी जारी थी।

०००
राजकिशोर

1 comment:

सतीश पंचम said...

यह सपना अब हर बडे शहर वाला देखने लगा है, उसे अपना गांव या छोटा शहर अब प्यारा लगने लगा है । यह एक प्रकार की अर्धनग्न सच्चाई है।

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