Thursday, June 19, 2008

दुर्दिन वृद्धों के

एक श्लोक - 308
॥ दुर्दिन वृध्दों के ॥


गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलि:,
दृष्टिर्नश्यति वर्धते वधिरता वस्त्रं च लालायते।
वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनै: भार्या न सुश्रुषते,
हा! कष्टं पुरुषस्य जीर्णवपस: पुत्रोऽप्यमित्रायते॥

-शार्गंधर

 


शरीर सभी तरह कमजोर हो गया- क्योंकि न ठीक से चल पा रहा है, न खा पा रहा है। दाँत गिर चुके हैं। ऑंखों से दिखाई नहीं देता। कानों से सुनाई नहीं देता। गर्दन और सिर हिलने, अथवा दिल काँपने की बीमारियाँ हो गयी हैं। खास जिगरी दोस्त और भाई बन्धु भी अब बात तक नहीं सुनते हैं, बात मानना तो दूर की बात है।
यहाँ तक कि स्थायी और आस्तिक श्रोता रही धर्मपत्नी भी अब बात नहीं सुनती है। कलेजे का टुकड़ा, आशाओं और अरमानों का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ केन्द्र आत्मज अर्थात् बेटा भी अब दुश्मनों जैसा बर्ताव करता है। सचमुच बुढ़ापा बड़े बुरे दिन लेकर आता है। लेकिन इससे बचा भी तो नहीं जा सकता।

कौमार, यौवन और जरा अवस्थाओं से तो गुजरना ही पड़ता है। कोई इससे बच नहीं सकता। पुत्र जो अब पिता का शत्रु बन बैठा है, उसे भी पिता की तरह बूढ़ा होना पड़ेगा। परन्तु वर्तमान में तो जो है, सो है।
पर ऐसी स्थिति क्यों बनी? कौन इसके लिए जिम्मेदार हैं? माता-पिता, सन्तान, रोजगार की दूरी अथवा अन्य कई परिस्थितियाँ? कारण जो भी हों, परन्तु दशा, दुर्दशा में बदल चुकी है, स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। पीर पर्वत-सी हो गयी है। अब तो हिमालय से करुणा और प्रेम की पयस्विनी गंगा निकलनी ही चाहिए।

ये कैसी विडम्बना है कि श्रवण कुमार और श्रीराम के इस महान् राष्ट्र भारतवर्ष में माननीय न्यायालय को प्रवासी और सम्पन्न भारत वंशजों को अपने माता-पिता के संरक्षण के विषय में कहा जा रहा है। क्या बच्चे इतने कृतघ्न हो गये हैं कि उन उँगलियों के प्रति उँगली उठाते हैं जिन्होंने सहलाया, बढ़ाया, खिलाया-पिलाया और चलना सिखाया। पूरी तरह से न सही किन्तु रोजगार की दूरी, बदलती पररिस्थिति और अभिभावकों की असहिष्णुता भी कारण हो सकती है।

किन्तु बड़ा कारण समर्थ पुत्रों की बेरुखी ही होनी चाहिए। उन्हें कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।


-महेशचन्द्र शर्मा
स्मृति नगर, भिलाई (छ.ग.)

('देशबंधु' से )

6 comments:

डॊ. कविता वाचक्नवी said...

test msg

Amit K. Sagar said...

पिता-पुत्र पर सराहनीय लेख. सोचने को बिवश करता हुआ. कम शब्दों में बहुत उम्दा. लिखते रहिये.
---
उल्टा तीर

डॊ. कविता वाचक्नवी said...

धन्यवाद अमित.

सुभाष नीरव said...

कविता जी
बहुत अच्छी शुरूआत है। बधाई ।

इरफान अली सैफी said...

अब मैं बूढा नहीं होना चाहता, बधाई

डॊ. कविता वाचक्नवी said...

सुभाष जी और इरफान जी,

धन्यवाद पधारने का भी और सराहने का भी.
सद्भाव बनाए रखें.

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